मंगलवार, 21 सितंबर 2010
हम ही है हिंदुस्तान
हिन्दू कटे या कटे मुसलमान ,सबसे पहले दोस्तों कटेगा हिंदुस्तानसंगम से बना है देश हर धर्म इसकी जान , कई धर्मो , भाषाओ ,संस्कृतियों से मिलकर बना है हिंदुस्तान ।हिंदुस्तान शरीर है धर्म इसकी भुजाये एक भी भुजा कटी तो अधुरा रहेगा हिंदुस्तानहै उदारहण पडोशी देशो की पहचान , कट कट कर जो बने है और लगते है बेजानकहते है इनका या उनका है हिंदुस्तान ,वो खुद ही नहीं जानते क्या चीज है हिंदुस्तानचंद स्वार्थियो के चक्कर में हम अगर पड़ जायेंगे, स्वार्थी स्वार्थ निकालेंगे और हम खड़े पछतायेंगेनेता कुर्सी की तलाश में अपने घोड़े दौड़ाएंगे, इन घोड़ो के पैरो से बस मानव रौंदे जायेंगेमानवता होगी शर्मशार और नेता खुशी मनाएंगे, विश्व पटल पर भारत की संकीर्ण छवि बनायेंगेवो घूमेंगे ए० सी 0 में और हम फुटपाथ पर रात बिताएंगे,कभी कभी कुछ जलशो में वो हम पर रहम दीखायेंगे ,पीछे मुड़ते ही हमारी गरीबी लाचारी का मजाक उड़ायेंगे हमसे ही बने है वो और वी ० वी ०आई० पी ० कहलायेंगे , अब हम उनके दरवाजे के अन्दर नहीं घुसने पाएंगे इसलिए दोस्तों कहता हू लो खुद को पहचान ,इससे पहले फिर एक बार जल उठे हिंदुस्तानबेनकाब करो इन अलगाववादी ताकतों को और बता दो ,न हम हिन्दू है न है हम मुसलमान , हम जान गए है की हम ही है हिंदुस्तान हम ही है हिंदुस्तान ............
बुधवार, 25 अगस्त 2010
टूटता दिख रहा है कुठियाला का तिलिश्म
माखनलाल में रहना है तो हमसे मिलकर चलना है , कुठियाला मुर्दाबाद , कुठियाला के कार्यकाल की जाँच हो , कर्मचारी एकता जिंदाबाद , जो हमसे टकराएगा चूर चूर हो जायेगा हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है । ये नारे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में आज शिक्षक कर्मचारी और अधिकारी जोर जोर से चिल्लाकर लगा रहे थे और इन्ही नरो को तख्ती प़र लिख कुलपती के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे । विश्वविद्यालय के कुलपति बी० के० कुठियाला की नियुक्ति और पद सँभालने के कुछ दिन बाद से ही उन पर अनके आरोप लगाये जारहे थे कुछ लोग तो तो इनकी नियुक्ति पर भी सवालिया निशान लगाते हुए कहते है की इसके पीछे बहुत बड़ी राजनीति है और इसमें इनका संघी होना बहुत काम आया है इनने भी यहाँ पहुचते ही सबसे पहले विश्वविद्यालय के लैटर पैड का रंग बदल कर भगवा रंग दे दिया तभी से लोग कयास लगा रहे थे की अब पत्रकारिता विश्वविद्यालय का भगवाकरण होने वाला है । तब से आज तक कुलपति जी के सारी नीतियों को चुप चाप मानता चला आ रहा प्रशासन और कर्मचारियों के सब्र का बांध आज टूट ही गया हड़ताल और प्रदर्शन का कारण पता करने पर कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अर्जुन लाल गोहरे ने बताया की विश्वविद्यालय तेलंगा के कार्यालय में १०० से अधिक कर्मचारी टास्क पर नियुक्त है इन को न तो परमानेंट किया जा रहा न इनके वेतन में कोई वृद्धी की जा रही है , खाली पड़े पदों के भर्ती का आदेश होने के बाद भी इसे भरा नहीं जा रहा है इन्होने मांग की है की पिछले लगभग १० वर्षो से संस्था को ३ से ४ हज़ार रुपयों में अपनी सेवा दे रहे कर्मचारियों को एक सरल प्रक्रिया के तहत नियमित किया जाये कुलपति पर आरोप लगते हुए इन्होने कहा कि ये बिना किसी को कोई जानकारी दिए गुपचुप तरीके से शासन को पत्र लिखकर रजिस्ट्रार और परिक्षानियांत्रक के पद पर आपने आदमियों को बैठना चाहते है जबकि वर्तमान में इन पदों को देख रहे डा० श्रीकांत सिंह और राजेश पाठक बढ़िया काम कर रहे है । कर्मचारियों की मांग है डा० श्रीकांत सिंह रजिस्ट्रार के पद की योग्यता रखते है और इन्हें ही इस पद पर रखा जाये क्योकि ये लम्बे समय से हमारे बीच में है और हमारी समस्यायों को भलीभांति समझ सकते है । वर्तमान में आप प्रसारण पत्रकरिता विभाग के एच० ओ० डी० के पद पर रहते हुए भी अपनी जिम्मेदारी को बहुत अच्छे ढंग से निभा रहे है । इनका कहना है श्री कुठियाला के आने के बाद यहाँ भ्रस्टाचार फैल गया है यू० टी० डी० सेंटर के संचालको की ओर से शिकायत आ रही है की कुलपति द्वार बनाई तीन सदस्यीय टीम घूस लेकर सेंटर को मान्यता दे रही है । कर्मचारियों ने कहा की अभी कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय के काम से जा रहे 3 कर्मचारी की रात में दुर्घटना से दर्दनाक मौत हो गयी लेकिन उनके परिवार को कोई विशेष आर्थिक सहायता नही दी गयी , इन्हें जल्द सहयता दिया जाये और इनके परिवार से एक एक सदस्य की अनुकम्पा पर नियुक्ति की जाये । सब ने एक सुर में कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए कहा की यदि जल्दी हमारी मांगे पूरी नहीं हुयी तो हम गांधवादी ढंग से हड़ताल करेंगे और लम्बी लडाई लड़ेंगे । यह था आज के तजा घटनाक्रम का हल कुछ दिन पीछे चले तो पता चलता है की कुलपति जी आते ही केवल सत्ता आपने हाथ में लेना चाहते थे इसके लिए आप अपने मन से कानून पर कानून बनाते रहे और लोग आँख बंद कर मानते रहे चाहे वाह शुराक्षकर्मियो की संख्या घटना हो या कुछ ओर परिवर्तन की बयार कुछ ऐसे चली की विश्वविद्यालय के पानी के सहारे जीने वाले लडको को १० बजे के बाद विश्वबिद्यालय में घुसना मना कर दिया गया यहाँ पढने वाले लड़के अपने घर से ज्यादा समय यहाँ बिताते थे यहाँ पर विभिन्न विषयों पर रात में घंटो बहस होती रहती थी पर अब नहीं । अभी हद नहीं हुयी इस छोटे से विश्वविद्यालय में १४ नए कोर्स शुरू किये गए जबकी पहले से चल रहे कोर्सो के लडको का भविष्य अभी तक अँधेरे में है इनके प्लेसमेंट की कोई ब्यवस्था नहीं है इस वर्ष निकले बड़ी संख्या में छात्र बेरोजगार घूम रहे है । कुलपति के सामने छात्रो ने गुहार लगाई थी पर कोई सुनवाई नहीं हुयी इन छात्रो में कई ऐसे है जिन्होंने अपना कोर्स लोन लेकर किया है।आपने विश्वविद्यालय में प्रवेश की परम्परागत प्रेवश परीक्षा को समाप्त कर मेरिट सिस्टम लागू किया जिसका परिणाम यह रहा की ४ लिस्ट निकलने के बाद भी कई विभागों की सीटे खाली पढी है। जो नए कोर्स शुरू किये गए उनमे कुछ में तो कोई आवेदन ही नहीं आया ओर कुछ में २य ३ छात्रो का प्रवेश हुआ इसके आलावा पढ़ाने के लिए शिक्षक नदारद है । कुल मिलकर यहाँ छात्रो के भविष्य के साथ गन्दा मजाक करने की कोशिश की जा रही है पर अब तक सब चुप थे अब जब बात आपने पर आयी तो लोगो ने चिल्लाना शुरू किया खैर आवाज बुलंद है ओर लगता है कि आब कुलपति का तिलिस्म टूट रहा है वैसे अभी तक यह विश्वविद्यालय राम भरोसे चल रहा है कदम कदम पर भ्रस्टाचार है देखना यह होगा कि कुछ बदल पता है या सबके मुह ,बंद कर दिए जायेंगे ।
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
मीडिया को कोसना बंद करे ...
जाने माने फ़िल्मकार महेश भट्ट ने मीडिया पर अपनी भड़ास निकलते हुआ दैनिक जागरण के सम्पादकीय में लिखा है की खबरे देते हुए अपने सीमओं और कर्तब्यो को भूल जाता है। आपको इस बात का बहुत कष्ट है की मीडिया निजी जीवन में घुस रहा है, हमारे बेडरूम तक घुस रहा है , आम आदमी को रिपोर्टर की तरह प्रयोग कर रहा है । खैर गलत कुछ नहीं है ।
पिछले कुछ दिनों से मीडिया के खिलाफ लिखना एक फैसन सा बनता जा रहा है और खास करके इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ, लेकिन मै यह नहीं समझ पा रहा हूँ की इन लोगो को मीडिया के बेडरूम में घुसने से दिक्कत क्यों है? भारत के लोग तो परेशान है की मीडिया उनके बेडरूम में नहीं पहुच रही है । क्योकी उनका बेड रूम ही उनका किचेन है, वही खाना बनाते है ,वही कपडे रखते है वही सोते है कोई बहार से मिलने आ जाये तो वही बैठ कर मिलते भी है , इन्हें दुःख इस बात का है की मीडिया हमारी निजी जिन्दगी में नहीं झाकता है। वो कहते है मीडिया दिखाए की आज हम बिना खाए सो गए है, आज मालिक नाराज थे तो पैसा नहीं मांग सका खाना नहीं बना बच्चे भी भूखे है, पर ऐसा हो नहीं रहा है।साहब लिखते है की मीडिया को अपना खुद का कोड ऑफ़ सेंसरशिप तैयार करना चाहिए , लोगो को ऐसी खबरों का वहिष्कार करना चाहिए जो मानवीय सम्बेदानाओ को और भावनाओ को आहात करने वाली होसाहाब अपनी फिल्मे बनाते वक्त ऐसा कई नहीं सोचते है । तब तो आप कहते है जो डिमांड है मै उसकी पूर्ती कर रहा हू , आप कहते है की मै फिल्मो पर पैसा लगता हू पैसा कमाने के लिए उस समय इनके जेहन में यह ख्याल नहीं आता की उनके इस कृत्य का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा । पिछले दिनों मीडिया ने कुछ गलतिया की लेकिन वो नियोजित नहीं था और उसके बाद लगातार आलोचनों का शिकार होकर उसने सुधार भी किया , पर आज परेशानी इण्डिया के लोगो को है उन १० से २० प्रतिशत लोगो को है जो आम जनता पर शासन कर रहे है इनके चहरे बाहर से जितने साफ दीखते है ये अन्दर उतने ही गंदे है पर ये चाहते है की इनकी गंदगी छुपी रहे और ये आराम से शासन करते रहे , इनके बेडरूम में गड़बड़ी है इसलिए ये वहा मीडिया का आना नहीं पसंद करते है पर मुझे खुशी है की मीडिया अपना काम कर रही है, गरीबो की गरीबी दिखा नहीं पा रही है कम से कम अमीरों की ऐयाशी तो दिखाती है , ये लोग मीडिया को गली देंगे की यह नहीं दिखाना चाहिए पर खुद नहीं सोचेंगे की यह नहीं करना चाहिए । मुझे समाज के इन कथित बुद्धिजीवियों से यही कहना है की मीडिया पर अंकुश लगाने से पहले खुद पर अंकुश लगाओ , खुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करो , मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई?
जरी रहेगा .............
पिछले कुछ दिनों से मीडिया के खिलाफ लिखना एक फैसन सा बनता जा रहा है और खास करके इलेक्ट्रोनिक मीडिया के खिलाफ, लेकिन मै यह नहीं समझ पा रहा हूँ की इन लोगो को मीडिया के बेडरूम में घुसने से दिक्कत क्यों है? भारत के लोग तो परेशान है की मीडिया उनके बेडरूम में नहीं पहुच रही है । क्योकी उनका बेड रूम ही उनका किचेन है, वही खाना बनाते है ,वही कपडे रखते है वही सोते है कोई बहार से मिलने आ जाये तो वही बैठ कर मिलते भी है , इन्हें दुःख इस बात का है की मीडिया हमारी निजी जिन्दगी में नहीं झाकता है। वो कहते है मीडिया दिखाए की आज हम बिना खाए सो गए है, आज मालिक नाराज थे तो पैसा नहीं मांग सका खाना नहीं बना बच्चे भी भूखे है, पर ऐसा हो नहीं रहा है।साहब लिखते है की मीडिया को अपना खुद का कोड ऑफ़ सेंसरशिप तैयार करना चाहिए , लोगो को ऐसी खबरों का वहिष्कार करना चाहिए जो मानवीय सम्बेदानाओ को और भावनाओ को आहात करने वाली होसाहाब अपनी फिल्मे बनाते वक्त ऐसा कई नहीं सोचते है । तब तो आप कहते है जो डिमांड है मै उसकी पूर्ती कर रहा हू , आप कहते है की मै फिल्मो पर पैसा लगता हू पैसा कमाने के लिए उस समय इनके जेहन में यह ख्याल नहीं आता की उनके इस कृत्य का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा । पिछले दिनों मीडिया ने कुछ गलतिया की लेकिन वो नियोजित नहीं था और उसके बाद लगातार आलोचनों का शिकार होकर उसने सुधार भी किया , पर आज परेशानी इण्डिया के लोगो को है उन १० से २० प्रतिशत लोगो को है जो आम जनता पर शासन कर रहे है इनके चहरे बाहर से जितने साफ दीखते है ये अन्दर उतने ही गंदे है पर ये चाहते है की इनकी गंदगी छुपी रहे और ये आराम से शासन करते रहे , इनके बेडरूम में गड़बड़ी है इसलिए ये वहा मीडिया का आना नहीं पसंद करते है पर मुझे खुशी है की मीडिया अपना काम कर रही है, गरीबो की गरीबी दिखा नहीं पा रही है कम से कम अमीरों की ऐयाशी तो दिखाती है , ये लोग मीडिया को गली देंगे की यह नहीं दिखाना चाहिए पर खुद नहीं सोचेंगे की यह नहीं करना चाहिए । मुझे समाज के इन कथित बुद्धिजीवियों से यही कहना है की मीडिया पर अंकुश लगाने से पहले खुद पर अंकुश लगाओ , खुद गलत काम करना बंद करो मीडिया अपने आप तुम्हारा पीछा छोड़ देगी और बहुत हो चुका अब मीडिया को कोसना बंद करो और बैठ कर आत्ममंथन करो , मै चाहता हू की मीडिया मेरे पीछे आये पर आती ही नहीं मेरे गाँव का बदलू भी चाह्ता है की मीडिया आये पर आती ही नहीं क्या करे भाई?
जरी रहेगा .............
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
मंदिर के बिना नहीं होगी राजनीत ..
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में एक बात तो खुल कर सामने आ गयी की भा० जा० पा० बिना मंदिर के राजनीत नहीं कर पायेगी । नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कुछ बाते ऐसी कही की मन खुश हो गया ,
जैसे - अब दिल्ली का दौरा करने से टिकेट नहीं मिलेगा , टिकेट चाहिए तो गाँव में जाओ आम आदमी के लिए काम करो ।
किसी को काटकर छोटा मत करो खुद बड़े बन जाओ । आप ने युवाओ की जरुरत अपनी पार्टी में समझी और पार्टी को आधुनिक सुबिधाओ से लैस बनाने की कोशिश की । सब कुछ बहुत अच्छा गया और गडकरी जी ने बहुत अच्छे से अपनी शक्ती प्रदर्शन किया लेकिन जाते जाते उन्हें मंदिर फिर याद आ गया ।
आज देश तमाम समस्याओ से घिरा हुआ है । महगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है , देश आंतरिक सुरक्षा से जूझ रहा इसमें शांती लेन के बजाये आग में घी डालने का काम कर रहे है ।
मुझे समझ में यह नहीं आ रहा है की की जब मंदिर का मामला कोर्ट में है तो क्यों न यह पार्टी अपना पूरा दम लगाकर जल्दी से सही निर्णय निकलवाती है जिससे मंदिर बनसके ।
सुझाव के लिए बस इतना कहना चाहूँगा की आप मंदिर के बारे में अब सोचना बंद करो आप तो अगर सोच सकते हो देश के बारे में सोचो , कुर्सी की राजनीत को छोड़कर विकाश की राजनीत करो । अगर आप आम आदमी के लिए काम करोगे तो आम आदमी आप के लिए करेगा ।
आपसे उम्मीद इसलिए है की आप कम से कम यह तो समझ गए है की किसी को छोटा मत करो खुद बड़ा बनो । आम आदमी को आप भूलेंगे तो जनता आपको भूलेगी । बाकी सोचना आप का काम है... सिर्फ स्टेज पर खड़े होकर बड़ी बड़ी बात करने काम नहीं चलने वाला है कुछ काम करके दिखाईये ।
जारी रहेगा .......................
जैसे - अब दिल्ली का दौरा करने से टिकेट नहीं मिलेगा , टिकेट चाहिए तो गाँव में जाओ आम आदमी के लिए काम करो ।
किसी को काटकर छोटा मत करो खुद बड़े बन जाओ । आप ने युवाओ की जरुरत अपनी पार्टी में समझी और पार्टी को आधुनिक सुबिधाओ से लैस बनाने की कोशिश की । सब कुछ बहुत अच्छा गया और गडकरी जी ने बहुत अच्छे से अपनी शक्ती प्रदर्शन किया लेकिन जाते जाते उन्हें मंदिर फिर याद आ गया ।
आज देश तमाम समस्याओ से घिरा हुआ है । महगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है , देश आंतरिक सुरक्षा से जूझ रहा इसमें शांती लेन के बजाये आग में घी डालने का काम कर रहे है ।
मुझे समझ में यह नहीं आ रहा है की की जब मंदिर का मामला कोर्ट में है तो क्यों न यह पार्टी अपना पूरा दम लगाकर जल्दी से सही निर्णय निकलवाती है जिससे मंदिर बनसके ।
सुझाव के लिए बस इतना कहना चाहूँगा की आप मंदिर के बारे में अब सोचना बंद करो आप तो अगर सोच सकते हो देश के बारे में सोचो , कुर्सी की राजनीत को छोड़कर विकाश की राजनीत करो । अगर आप आम आदमी के लिए काम करोगे तो आम आदमी आप के लिए करेगा ।
आपसे उम्मीद इसलिए है की आप कम से कम यह तो समझ गए है की किसी को छोटा मत करो खुद बड़ा बनो । आम आदमी को आप भूलेंगे तो जनता आपको भूलेगी । बाकी सोचना आप का काम है... सिर्फ स्टेज पर खड़े होकर बड़ी बड़ी बात करने काम नहीं चलने वाला है कुछ काम करके दिखाईये ।
जारी रहेगा .......................
गुरुवार, 17 दिसंबर 2009
पढ़ कर कैसे हो गए .....
बचपन का वो दिन जब मै इतना जनता था की अगर कोई आपसे कुछ मांग रहा है तो यह उसकी जरुरत है । और अगर मै उसको नहीं दे रहा हू तो ये गलत है । उस समय तक मुझे यह नहीं पता था कि भिखमंगी एक धंधा भी होता है।
उन्ही दिनों की बात है घर पर दोपहर के समय एक भिखारी आया था बहार बड़ी जोर जोर से आवाज़ दे रहा था , मै बहार निकला उसे देखकर वापस आया और मां से बोला की कुछ दे दो बहार एक भोखारी बेचारा खड़ा है और बहुत देर से चिल्ला रहा है मां ने मना किया और बोली सुबह से चार लोग आ चुके है ये पांचवा है ॥ कोई जरुरत नहीं है इनको भीख देने कि ये दिन भर में हमसे ज्यादा कमाते होंगे । पर मेरे मन को संतोष न हुआ और मै जिद पर अड़ गया कि उसे देना ही होगा । मां ने मेरी जिद पूरा करने के लिए थोडा सा अनाज दिया और मैंने उस भिखारी को दे दिया मुझे लगा मैंने एक अच्छा काम किया है लेकिन मन में याह प्रश्न बना रहा कि जब वो हमसे अच्छा कमाता तो भीख क्यों मांगता फिर मै धीरे धीरे करके इस प्रश्न को भूल गया ।
धीरे धीरे करके मै बड़ा हो गया था और घर से बाहर रहकर पढ़ाई कर रहा था ढेरो किताबे पढी और ट्रैफिक सिग्नल जैसी कई फिल्मे देखी मरे मन में यह भावना घर कर गयी थी भीख मांगना अब एक पेशा बन चुका है और भीख देना गलत बात है । मैंने लगभग पिछले पांच सालो में किसी को एक पैसा भीख नहीं दिया और और घर से निकलने के बाद रोज कमसे काम बीस भिखारियों से सामना होता होगा
अब फिर लगता है की भिखमंगी के इस धंधे में कई भिखारी ऐसे भी भी होंगे जो वास्तव में ज़रूरतमंद होंगे अब फिर मुझे वही प्रश्न परेशान कर रहा है कि बचपन में मै सही था या मां और अब मुझे क्या करना चाहिए ?......................
जरी रहेगा ...
उन्ही दिनों की बात है घर पर दोपहर के समय एक भिखारी आया था बहार बड़ी जोर जोर से आवाज़ दे रहा था , मै बहार निकला उसे देखकर वापस आया और मां से बोला की कुछ दे दो बहार एक भोखारी बेचारा खड़ा है और बहुत देर से चिल्ला रहा है मां ने मना किया और बोली सुबह से चार लोग आ चुके है ये पांचवा है ॥ कोई जरुरत नहीं है इनको भीख देने कि ये दिन भर में हमसे ज्यादा कमाते होंगे । पर मेरे मन को संतोष न हुआ और मै जिद पर अड़ गया कि उसे देना ही होगा । मां ने मेरी जिद पूरा करने के लिए थोडा सा अनाज दिया और मैंने उस भिखारी को दे दिया मुझे लगा मैंने एक अच्छा काम किया है लेकिन मन में याह प्रश्न बना रहा कि जब वो हमसे अच्छा कमाता तो भीख क्यों मांगता फिर मै धीरे धीरे करके इस प्रश्न को भूल गया ।
धीरे धीरे करके मै बड़ा हो गया था और घर से बाहर रहकर पढ़ाई कर रहा था ढेरो किताबे पढी और ट्रैफिक सिग्नल जैसी कई फिल्मे देखी मरे मन में यह भावना घर कर गयी थी भीख मांगना अब एक पेशा बन चुका है और भीख देना गलत बात है । मैंने लगभग पिछले पांच सालो में किसी को एक पैसा भीख नहीं दिया और और घर से निकलने के बाद रोज कमसे काम बीस भिखारियों से सामना होता होगा
अब फिर लगता है की भिखमंगी के इस धंधे में कई भिखारी ऐसे भी भी होंगे जो वास्तव में ज़रूरतमंद होंगे अब फिर मुझे वही प्रश्न परेशान कर रहा है कि बचपन में मै सही था या मां और अब मुझे क्या करना चाहिए ?......................
जरी रहेगा ...
मंगलवार, 24 नवंबर 2009
अस्पताल और आम आदमी
आज बड़े पैमाने में लोग छोटी बीमारी की दावा मेडिकल स्टोर से ही ले लेते है , अस्पताल जाने से बचते है ॥ ऐसा क्यो ? लंबे समय से यह प्रश्न परेशान करता था अब उत्तर मिल गया ।
दरशल सरकारी अस्पतलो की दशा तो पहले से शुभान अल्लह है और निजी अस्पतालों में जाने का नम सुनकर ही मरीज की बीमारी बढ़ जाती है । इसका एक ताज़ा अनुभव मेरे पास है ॥ अभी अभी मेरे एक मित्र रोड पर कर रहे थे की मोटरसायकिल सवार नव युवक उन्हें ठोकर मरकर चला गया मित्र सड़क पर गिर गए और बेहोश हो गए दोस्त आनन फानन में उन्हें लेकर पास के नेशनल हॉस्पिटल ले गए डॉक्टर ने तुरंत दो हज़ार की दावा लिख दी । दावा आयी । और फिर डॉक्टर साहब ने अपने सरे संदेह दूर कर लिए जितनी जाँच सम्बह्व हो सकती है सब कर ली गयी । सब कुछ नोर्मल निकला । मित्र को मामूली चोटे आयी थी लेकिन उन्हें २४ घंटे रोके रखना अनिवार्य बताया गया । खैर सब हो गया ॥
अब बरी थी डिस्चार्ज कराने की तो सुबह अस्पताल का कुल बिल पञ्च हज़ार रुपये से कुछ अधिक था । जिसमे दो हज़ार रत भर अस्पताल में रुकने का चार्ज था । अब मित्र घर आ गए है चोट में कोई दर्द नही है सब कुछ सामने है । बस दर्द है की पञ्च हज़ार का ।
जरा सोंचे एक आम आदमी ओ भी छात्र है उसके लिए कितना मायने रखता है यह सब ? क्या वह फिर कभी अपने किसी मित्र को ले जाएगा अस्पताल? यह है स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण ॥
जरी रहेगा .....
दरशल सरकारी अस्पतलो की दशा तो पहले से शुभान अल्लह है और निजी अस्पतालों में जाने का नम सुनकर ही मरीज की बीमारी बढ़ जाती है । इसका एक ताज़ा अनुभव मेरे पास है ॥ अभी अभी मेरे एक मित्र रोड पर कर रहे थे की मोटरसायकिल सवार नव युवक उन्हें ठोकर मरकर चला गया मित्र सड़क पर गिर गए और बेहोश हो गए दोस्त आनन फानन में उन्हें लेकर पास के नेशनल हॉस्पिटल ले गए डॉक्टर ने तुरंत दो हज़ार की दावा लिख दी । दावा आयी । और फिर डॉक्टर साहब ने अपने सरे संदेह दूर कर लिए जितनी जाँच सम्बह्व हो सकती है सब कर ली गयी । सब कुछ नोर्मल निकला । मित्र को मामूली चोटे आयी थी लेकिन उन्हें २४ घंटे रोके रखना अनिवार्य बताया गया । खैर सब हो गया ॥
अब बरी थी डिस्चार्ज कराने की तो सुबह अस्पताल का कुल बिल पञ्च हज़ार रुपये से कुछ अधिक था । जिसमे दो हज़ार रत भर अस्पताल में रुकने का चार्ज था । अब मित्र घर आ गए है चोट में कोई दर्द नही है सब कुछ सामने है । बस दर्द है की पञ्च हज़ार का ।
जरा सोंचे एक आम आदमी ओ भी छात्र है उसके लिए कितना मायने रखता है यह सब ? क्या वह फिर कभी अपने किसी मित्र को ले जाएगा अस्पताल? यह है स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण ॥
जरी रहेगा .....
बुधवार, 18 नवंबर 2009
साधो इतना दीजिये जमे कुटुंब समय ...
आज हम जिस दोर में जी रहे है ये दौर कैसे आया किसकी देन है यह सब । मै उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के पटना खरगौरा ग्रामसभा के पटना गाँव का रहने वाला ..भारत का एक नागरिक हूँ ।
गाँव से बहार निकलकर शहर में आया की अच्छे से पढ़ाई करूँगा और सहरो की तेज रफ़्तार का हिस्सा बनूँगा, होश तो तब आया जब समझ में आया की इस रफ़्तार का हिस्सा बनना हो तो बनो पर ये उम्मीद मत करना की दौड़ते -दौड़ते अगर आप गिर गए तो की कोई आपको कन्धा देने के रुकेगा । यहाँ दौड़ जीतने के लिए है और जो रुक गया वो हारेगा। लोगो को इतना नही पता की की उनका पड़ोसी क्या करता है , आज उसके बच्चो ने खाना खाया है की नही बस जागते तो जीतने के लिए और सोते है तो जीतने के लिए ।
कितना अच्छा था अपना गाँव कम से कम शुबह शाम लोग मिलते थे और पूछते थे कैसे हो भैया कोई परेशानी तो नहीं है . भूख लगी है और अपने घर खाना बनने में देर है तो पड़ोसी के घर खाना खाना खा लिया .. कभी जो किसी के घर कुछ खास बना तो अपनने आप खिसकते हुए अपने घर तक आ जाता था , आज लग रहा है चमक दमक न सही पर असली भारत गाँव में बसता है । ... जहा हर मर्ज की दावा है अपनो का प्यार .अपनों का प्यार , वाह रे मेरा गाँव ...........
......................................... जरी रहेगा .......
गाँव से बहार निकलकर शहर में आया की अच्छे से पढ़ाई करूँगा और सहरो की तेज रफ़्तार का हिस्सा बनूँगा, होश तो तब आया जब समझ में आया की इस रफ़्तार का हिस्सा बनना हो तो बनो पर ये उम्मीद मत करना की दौड़ते -दौड़ते अगर आप गिर गए तो की कोई आपको कन्धा देने के रुकेगा । यहाँ दौड़ जीतने के लिए है और जो रुक गया वो हारेगा। लोगो को इतना नही पता की की उनका पड़ोसी क्या करता है , आज उसके बच्चो ने खाना खाया है की नही बस जागते तो जीतने के लिए और सोते है तो जीतने के लिए ।
कितना अच्छा था अपना गाँव कम से कम शुबह शाम लोग मिलते थे और पूछते थे कैसे हो भैया कोई परेशानी तो नहीं है . भूख लगी है और अपने घर खाना बनने में देर है तो पड़ोसी के घर खाना खाना खा लिया .. कभी जो किसी के घर कुछ खास बना तो अपनने आप खिसकते हुए अपने घर तक आ जाता था , आज लग रहा है चमक दमक न सही पर असली भारत गाँव में बसता है । ... जहा हर मर्ज की दावा है अपनो का प्यार .अपनों का प्यार , वाह रे मेरा गाँव ...........
......................................... जरी रहेगा .......
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